9 जून 2017

2- लिक्खी है पाती
 
अब ये दुनिया नहीं है भाती
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

खून-खराबा है गलियों में,
छिपे हुए हैं बम कलियों में,
है फटती धरती की छाती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

उज़ड़ गये हैं घर व आँगन,
छूट गये अपनों के दामन,
यही देख के मैं घबराती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

है बड़ी बेचैनी मन में,
नफ़रत फैली है जन-जन में
नींद भी अब तो नहीं है आती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

Bhawna

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

सच में दुनिया ऐसी ही हो चली है...अच्छी रचना