9 जून 2017

2- लिक्खी है पाती
 
अब ये दुनिया नहीं है भाती
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

खून-खराबा है गलियों में,
छिपे हुए हैं बम कलियों में,
है फटती धरती की छाती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

उज़ड़ गये हैं घर व आँगन,
छूट गये अपनों के दामन,
यही देख के मैं घबराती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

है बड़ी बेचैनी मन में,
नफ़रत फैली है जन-जन में
नींद भी अब तो नहीं है आती,
तभी तुम्हें लिक्खी है पाती।

Bhawna

3 जून 2017

1-ज़रा रोशनी मैं लाऊँ 

छाया घना अँधेरा
ज़रा रोशनी मैं लाऊँ 
ये सोचकर कलम को
मैंने उठा लिया है...
घूमें गली-गली में 
नर-वहशी और दरिंदे
तड़पें शिकार होकर
घायल पड़े परिंदे
उनके कटे परों पर
मरहम लगा दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है...
सजदे में झुकते सर भी
रहते कहाँ सलामत
पूजा के स्थलों में 
आ जाये कब क़यामत 
नफरत पे प्रेम का रंग
थोड़ा चढ़ा दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है...                       
ढूँढें डगर कहाँ जब
क़ानून ही है अंधा
मर्ज़ी से इसको बदलें
नेताओं का है धंधा
आँखों में आस का अब
दीपक जला दिया है।
ये सोचकर कलम को
मैने उठा लिया है... 
"अंतर्राष्ट्रीय हिंदी कविता प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त"
Bhawna

3 मार्च 2017